संस्कृति श्लोक [ भागवत गीता, वेद] | bhagwat geeta shlok in Hindi

इस लेख मे हम हिंदू धर्म का पवित्र ग्रंथ, भागवद गीता, और वेद मे से कुछ संस्कृति श्लोको को व्याख्या सहित जानेंगे । भारत जैसे आध्यात्मिक देश मे श्लोको का बहुत महत्व है, हिंदू धर्म मे किसी भी धार्मिक कार्यक्रम मे श्लोक का पढा जाना पवित्र होता है। इसे लोगो के साथ साझा जरुर करे। Ved and bhagwat geeta shlok in Hindi लेख मे दिये गये श्लोक चारो वेद ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्व वेद से लिये गये है ।

संस्कृति श्लोक व्याख्या के साथ
Shlok in sanskrit with meaning in hindi

विषय सूची

#1 अग्ने यजिष्ठो अध्वरे देवान् देवयते यज । होता मन्द्रो वि राजस्यति स्रिधः ॥

bhagwat geeta shlok in Hindi

व्याख्या- जिस प्रकार ईश्वर की पूजा करने वाला मनुष्य दिव्य गुण, कर्म और स्वभाव प्राप्त करता है, और ईश्वर उन्हे पाप से बचाता है। उसी प्रकार एक गुरु शिष्य को विद्या, चरित्र, दिव्य गुण-कर्म-स्वभाव इत्यादि की शिक्षा देता है। और ब्रह्मचर्य विद्यातक, और विद्या विद्यातक और दुर्व्योहारो से बचाता है

#2 प्रेष्ठं वो अतिथिꣳ स्तुषे मित्रमिव प्रियम् । अग्ने रथं न वेद्यम्

bhagwat geeta shlok in Hindi
Shlok in sanskrit with meaning in hindi

व्याख्या- जिस प्रकार दोस्त सबको प्रिय होता है, उसी प्रकार ईश्वर की साधना या पूजा करने वाले को ईश्वर प्रिय होता है। जिस प्रकार एक रथ अपने गंतव्य स्थान पर पहुचने के लिये प्राप्तव्य होता है। उसी प्रकार ईश्वर प्रेम-मार्ग व श्रेय मार्ग को पाने के लिये पर्याप्त है। हृदय में बैठा ईश्वर अतिथि के समान है अर्थात ईश्वर अतिथि के समान , सम्मान जनक है ।

#3 अग्ने विवस्वदा भरास्मभ्यमूतये महे । देवो ह्यसि नो दृशे ॥

संस्कृति श्लोक [ भागवत गीता, वेद] | bhagwat geeta shlok in Hindi

व्याख्या- जिस प्रकार सूर्य देवता जीवो की रक्षा के लिये अंधकार दूर करके हर जगह उजाला करते है, वैसे  ही ईश्वर अविद्या, राग, द्वेष, मोह, अस्मिता, आदि के निवारण के लिये हमे आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते है, जिससे मनुष्य आत्मज्ञानी बनके सच के राह चल सके ।bhagwat geeta shlok in Hindi

#4 अग्ने युङ्क्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः । अरं वहन्त्याशवः ॥

संस्कृति श्लोक [ भागवत गीता, वेद] | bhagwat geeta shlok in Hindi

व्याख्या- हे प्रभु ! किये हुए कर्मफल के भोगार्थ तथा नवीन कर्म के सम्पादनार्थ शरीररूप रथ तथा इन्द्रिय, प्राण, मन एवं बुद्धि रूप घोड़े आपने हमें दिए हैं। आलसी बनकर हम कभी निरुत्साही और अकर्मण्य हो जाते हैं। आप कृपा कर हमारे इन्द्रिय, प्राण आदि रूप घोड़ों को कर्म में तत्पर कीजिए, जिससे वैदिक कर्मयोग के मार्ग का आश्रय लेते हुए हम निरन्तर अग्रगामी होवें

#5 परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत् । दधद्रत्नानि दाशुषे ॥

संस्कृति श्लोक [ भागवत गीता, वेद] | bhagwat geeta shlok in Hindi

व्याख्या- जैसे अन्नों और बलों की उत्पत्ति का निमित्त यज्ञाग्नि हवि देनेवाले यजमान को दीर्घायुष्य, आरोग्य आदि फल प्रदान करता है, वैसे ही उपासना यज्ञ में आत्म समर्पण रूप हवि देनेवाले स्तोता को परमेश्वर सद्गुण आदि रूप फल देता है ॥

संस्कृत श्लोकSanskrit Shlok

#1 यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे । प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न शꣳसिषम् ॥

संस्कृति श्लोक [ भागवत गीता, वेद] | bhagwat geeta shlok in Hindi
संस्कृत श्लोक

व्याख्या- मनुष्यों द्वारा जो भी नित्य या नैमित्तिक यज्ञ आयोजित किये जाते हैं, उनमें परमेश्वर का अवश्य स्मरण और आराधन करना चाहिए। महापुरुष मनुष्यों को यह प्रेरणा दें कि तुम निरन्तर वृद्धि और समुन्नति के लिए प्रयत्न करो। इस प्रकार उपदेश देनेवाले और उपदेश सुननेवाले सब मिलकर एकमति से सर्वज्ञ, सर्वव्यापक ईश्वर की स्तुति करें तथा ऐहलौकिक और पारलौकिक अभ्युदय को प्राप्त करें ॥Ved/ bhagwat geeta shlok in Hindi

#2 अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रꣳ राधो अमर्त्य । आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाꣳ उषर्बुधः

संस्कृति श्लोक [ भागवत गीता, वेद] | bhagwat geeta shlok in Hindi
संस्कृत श्लोक

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व्याख्या- सब जीव उषःकाल में प्रबुद्ध होनेवाले दिव्यगुणों को हृदय में धारण करते हुए उषा के समान तेज की किरणों से भरे हुये , प्राणवान्, यज्ञवान्, प्रबोधवान् और सत्यवान् होकर विद्वानों के संग से सदा जागरूक, सदाचारी और धर्मात्मा होवें

#3 एना वो अग्निं नमसोर्जो नपातमा हुवे । प्रियं चेतिष्ठमरतिꣳ स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम् ॥

संस्कृति श्लोक [ भागवत गीता, वेद] | bhagwat geeta shlok in Hindi
संस्कृत श्लोक

व्याख्या- जो ईश्वर  बल और प्राण का खजाना, पूर्णज्ञानी, सर्वव्यापक, सुखज्ञान आदि को देने वाला है  और दुःख-दारिद्र्य आदि का निवारण है, उस परमात्मा का यज्ञ करने में कुशल, दोषों को दूर होने वाला, सभी सदगुणों को प्राप्त कराने वाला और मरण धर्म से रहित होता है, उस परमात्मा की सबको प्रेम से श्रद्धा पूर्वक स्मरण करना चाहिए

#4 श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः । आ सीदतु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावभिरध्वरे ॥

संस्कृति श्लोक [ भागवत गीता, वेद] | bhagwat geeta shlok in Hindi
संस्कृत श्लोक

व्याख्या- जो मनुष्य प्रातःकाल ईश्वर की पूजा पूरे मन से व विश्वास से करता है उसमे ईश्वर के साथ-साथ शम, दम, तप, स्वाध्याय, दान, दया, न्याय आदि प्रकार के गुणो का निवेश होता है। वह सर्वगुण सम्पन्न व पवित्र और सत्य मार्ग पर चलता है।  Ved/bhagwat geeta shlok in Hindi

#5 देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्वो देव ओहते॥

व्याख्या- सभी मनुष्यो को चाहिये की वह प्रेमपूर्ण मन से ईश्वर की पूजा अर्चना करे। अप्ने हृदय से नकारात्मक विचारो को दूर करे। इस प्रकार से किया गया परमेश्वर की पूजा आपको निर्धारित लक्ष्य की ओर ले जाता है।

वेद श्लोक Ved Shlok in Hindi

इस लेख मे दिये गये श्लोक ऋग्वेद, सामवेद, व यजुर्वेद से लिये गये है। अगर कही त्रुटि हो तो क्षमा करे व कमेंट मे सुझाव अवश्य दे।

#6 अयमग्निः सुवीर्यस्येशे हि सौभगस्य । राय ईशे स्वपत्यस्य गोमत ईशे वृत्रहथानाम् ॥

व्याख्या- जैसे राजा अपनी राष्ट्रभूमि के सभी विद्यमान पदार्थ धन, धान्य, वीर पुरुष आदिकों का और गाय आदि पशुओं का रक्षक होता है, वैसे ही ईश्वर सब भौतिक और आध्यात्मिक धनों का रक्षक है। वही शारीरिक बल, आत्मिक बल, धृति, धर्म, कीर्ति, श्री, ज्ञान, वैराग्य, श्रेष्ठ सन्तान, गाय, भूमि, सूर्य और वेदवाणी हमें प्रदान करता है। वही जीवन के विनाशकारी पापों से हमारी रक्षा करता है। इसलिए उसे ईश्वर को कोटि-कोटि धन्यवाद देने चाहिए

चिपको आंदोलन क्या है

इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन । नरो हव्येभिरीडते सबाध आग्निरग्रमुषसामशोचि ॥

व्याख्या- जिस प्रकार यज्ञवेदि में यज्ञाग्नि को हवियों से प्रदीप्त करते हैं, उसी प्रकार मनुष्यों को चाहिए कि हृदय में ईश्वर को को स्मरण करें|Ved/bhagwat geeta shlok in Hindi

शुक्रं ते अन्यद्यजतं ते अन्यद्विषुरूपे अहनी द्यौरिवासि । विश्वा हि माया अवसि स्वधावन्भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु ॥

व्याख्या- जिस ईश्वर ने सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, ब्रम्हाण , इत्यादि वस्तु ये बनाई है और जो सारे जगत का रक्षक है। उसका उपकार हमें हमेशा याद रखना चाहिये। अर्थात ईश्वर की पूजा या  साधना करना चाहिये ।

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प्रातरग्निः पुरुप्रियो विश स्तवेतातिथिः । विश्वे यस्मिन्नमर्त्ये हव्यं मर्तास इन्धते ॥

व्याख्या- जिस प्रकार घर आये अतिथि का आदर सम्मान करते है, तथा उन्हे उपहार भेट करते है, उसी प्रकार जो मनुष्य अतिथि के तुल्य ईश्वर को  आत्मसमर्पण करते है। उन्हे ईश्वर आशिर्वाद देता है व सन्मार्ग में चलाता है। उसके जीवन से सभी अंधकार दूर हो जाता है। bhagwat geeta shlok in Hindi

प्रत्यग्ने हरसा हरः शृणाहि विश्वतस्परि । यातुधानस्य रक्षसो बलं न्युब्ज वीर्यम् ॥

व्याख्या- श्लोक का अर्थ है की सभी मनुष्यो का कर्तव्य है की वे ईश्वर की पूजा करे और अपने अंतरात्मा को जगाये, जिससे वो राजा/सेनापति/गुरु  के सहायता से अपने हृदय और समाज, और राष्ट्र में से सभी पापो को दूर कर सके,  

सामाजिक विज्ञान (Samajik Vigyan) – समाज क्या है।

यह लेख इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी से एकत्रित की गई है, कही त्रुटि होने पर क्षमा करे और कमेंट मे अपना सुझाव अवश्य दे। ताकि लेख को सुधारा जा सके। या अपना सुझाव हमारे टेलीग्राम चैंनल पर बताये। धन्यवाद Join Now

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